हमारी कहानी
गुरपुरब पर लंगर सेवा करते हुए हमारी मुलाक़ात हुई। सिमरन दाल परोस रही थीं और जसकरण पास ही रोटियाँ बेल रहे थे। दोनों यह जताते रहे कि सुबह इतनी जल्दी बीतने पर किसी का ध्यान नहीं गया। संगत का भोजन पूरा होते-होते हमने अगले सप्ताह फिर आने का वादा कर लिया था।
दो साल में अमृतसर हमारा अपना शहर बन गया—भोर से पहले हरमंदिर साहिब के दर्शन, लॉरेंस रोड के कुलचे और राम बाग में लंबी सैर, जब फूलवाले गेंदे सजाते थे।
एक अमृत वेला में, स्वर्ण गुंबद पर पहली किरण पड़ते देख जसकरण ने सिमरन से पूछा कि क्या वे जीवन भर उनके साथ लावाँ चलेंगी। पहले शबद के पूरा होने से पहले ही सिमरन ने हाँ कह दिया।