हमारी मुलाक़ात की कहानी
हम पहली बार पुराने शहर में रमज़ान इफ़्तार के दौरान चांदनी से भरे आंगन में मिले थे — आयशा फ़व्वारे के पास खजूर की थाली लेकर जा रही थी, और ज़ैद ड्योढ़ी का दरवाज़ा थामे खड़ा था, जब छतों से मगरिब की अज़ान गूंज रही थी। हलीम की एक प्लेट और एक घंटे की प्यारी बातों के बाद, हम में से कोई नहीं चाहता था कि यह शाम खत्म हो।
दो सालों तक हम बार-बार मिलते रहे — कभी किसी नुक्कड़ के कैफे में ईरानी चाय पर, तो कभी रात में चारमीनार की रोशन गलियों में टहलते हुए, जहाँ शहर सुनहरी चमक बिखेरता और हवाओं में इत्र की महक घुली होती।
एक शाम, एक खूबसूरत नए चाँद और फ़ानूस से जगमगाते आंगन में, ज़ैद ने आयशा से हमेशा उसका साथ देने को कहा। पहला तारा चमकने से पहले ही, उसने 'अल्हम्दुलिल्लाह' कह दिया।